सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा देने वाले कहा गुमशुदा है?फिल्में ही नही, विज्ञापन भी अश्लील,पूछता है भारत- दृश्य-श्रव्य माध्यम से कब होगी गंदगी दूर?

By Abhishek Raghuvanshi
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‘बेशरम रंग’ से ज्यादा शर्मनाक तो ये है कि ऐसी फिल्में उनके राज में आ-जा रही है जो ये दावा करते थे कि हम सत्ता में आये तो देश का ‘ सांस्कृतिक प्रदूषण’ झाड़कर फेंक देंगे। इसके लिए बरसो बरस ‘ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ‘ का नारा बुलंद होता रहा। अब 8 साल से सत्ता है। अश्लीलता परोसती फ़िल्म तो दूर, दृश्य श्रव्य माध्यम से एक विज्ञापन तक बन्द नही हुआ। खिलजी से पद्मावत ओर अब पठान का निर्माण और प्रदर्शन क्या यूपीए शासनकाल में हुआ? तो फिर सड़को पर रोष और जोश बॉलीवुड में अश्लीलता परोसते अधेड़ नायक नायिकाओं के खिलाफ क्यो? निशाने पर तो सेंसर बोर्ड, उसके 25 सदस्य, सूचना प्रसारण मंत्रालय, मंत्री अनुराग ठाकुर, केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड अध्यक्ष प्रसून जोशी होना चाहिए न? स्थाई समाधान तो इनके हाथों में जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करते थे।…तो घेरों न इन सबका घर। दबोचो इनकी गर्दन। आप हम कब तक सड़क पर उतरते रहेंगे?

बेशरम न रंग है न गाना और न हीरोइन है और न उसके वस्त्र। न दाढ़ी वाला शाहरूख न उसकी पठान। असली बेशरम तो वो सेंसर बोर्ड है जो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के अधीन काम करता है। इससे भी बड़ा बेशरम तो केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है जिसका एक अंग केंद्रीय सेंसर बोर्ड हैं। मंत्रालय भी ‘ कुलीन ‘ कुल के चिराग अनुराग ठाकुर के पास है। सरकार के मुखिया महाबली मोदी है और नीति नियंता है उनका वो संगठन जिसका ध्येय वाक्य ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ हैं। संगठन का ये ध्येय वाक्य दृश्य श्रव्य माध्यम के लिए बरसो बरस से है। 2014 के पहले तक ये धेय्य वाक्य देश के दृश्य श्रव्य माध्यम मे पसरी गंदगी को लेकर मुखर था। याद कीजिये सदन में विदुषी सुषमा स्वराज जी के इस सम्बंध में धाराप्रवाह ‘ओजस्वी ‘ वक्तव्य। ‘ सांस्कृतिक प्रदूषण ” शब्द भी गढा गया था और इस पर चौतरफा शोर भी मचाया गया था। दोषी उस वक्त की तत्कालीन सरकारे थी जो ‘ ध्येय वाक्य ‘ वालो की नजर में ‘सनातन के ढाँचे’ को तार तार कर रही थी। पारिवारिक जीवन मूल्यों को जमीदोंज करने के भारी भरकम आरोप भी इन सरकारों पर नियमित लगते थे।

…’ सनातन ढांचे ‘ को अब कौन तार तार कर रहा है? यूपीए की मनमोहन सरकार या कोई वामपंथी मूवमेंट्स? या कोई ‘बॉलीवुड का एजेंडा गिरोह’..? पठान को जनता के बीच जारी करने की इजाज़त इनमें से किसी ने दी है क्या? तो फिर किसके कहने से ये फ़िल्म देश भर में रिलीज होने की तैयारी में है? जबकि आपके हिसाब से ये फ़िल्म नाकाबिल बर्दाश्त है। तो फिर वो कौन लोग है, कौन सी संस्था है जो आपकी ‘ पवित्र ‘ भावनाओ को ठोकर में रखकर पहले तो फ़िल्म बनने देते है और फिर उसे सबके देखने लायक मानकर रिलीज करने की इजाज़त देते है?

आपको नही पता? तो पता कीजिये न। ये सब तो आपके अपने ही लोग कर रहे है। अन्यथा क्या मजाल पठान मैदान में आ जाये? पूछिये न प्रसून जोशी से। अब ये मत बोलना कि ये कौन? आपको नही पता ये ही तो है जिन्होंने ‘कालजयी साल 2014’ के लिए ‘ में देश नही झुकने दूंगा’ जैसा ‘कालजयी’ गीत लिखा था। महाबली मोदी जी के लिए। कितना सुंदर और ‘ गर्वित ‘ गीत। ‘विचारधारा ‘ के अनुकूल। इतने सुंदर विचारों से लबालब भरे प्रसून जोशी ने ही तो भगवा को ‘अपमानित’ करती पठान को हरी झंडी दी कि जाओ शाहरुख… देशभर में पठान दिखाओ। इसमे चोकने और हँसने की क्या बात? प्रसून ही तो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष है। 11 अगस्त 2017 से। खिलजी से लेकर पद्मावत भी इन्हीं प्रसून की पारखी नजर से होकर ही हरी झंडी पाई थी जिसे लेकर आप हम सबने हिंदुस्तान की सड़कों पर महीनों बवाल किया। प्रसून अकेले नही। बोर्ड में 25 अन्य सदस्य भी है। गेर सरकारी। बोर्ड एक वैधानिक संस्था है जो सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करता है। मुखिया है केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर।

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2014 से 2022…किसने रोका सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रदूषण को रोकने के लिए? 8 साल कम होते है? इतने सालों में दृश्य श्रव्य माध्यम में पसरी गंदगी कितनी साफ हुई? अश्लीलता की हद पार करती फिल्में तो दूर..आप तो एक अश्लील विज्ञापन तक बन्द नही करवा पाये। ऐसा क्यो? क्या केवल बॉलीवुड के खान कलाकारों का विरोध या बायकॉट से इस समस्या का समाधान हो जाएगा? सँस्कृति की चिंता में दुबले होते नेता और सरकार से सवाल कीजिये न कि इस दिशा के 8 साल में क्या कदम उठाए हैं? बॉलीवुड की गंदगी और सड़ांध को दूर करने के बस शोर ही मचा है या असल मे गन्दगी दूर हो रही है? अगर दूर हो रही है तो खिलजी से लेकर पठान जैसी फिल्में अस्तित्व में कैसे आ रही है? केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन समिति फ़िल्म की विषयवस्तु के हिसाब से सर्टिफिकेट देती है न? तो फिर ये क्या चल रहा है आपकी ‘ राष्ट्रवादी सरकार’ के कार्यकाल में?

इससे अच्छा तो कांग्रेस के शासन काल वाला सेंसर बोर्ड था। याद है एक फ़िल्म आई थी ग़ुलाम ए मुस्तुफा। नाना पाटेकर वाली। उस फ़िल्म का नाम सिर्फ मुस्तफा था। ज़ोरदार विरोध हुआ। भावनाएं तब भी आहत हुई थी। तब कांग्रेस और उसके सेंसर बोर्ड को अपने वोट बैंक की चिंता थी। सरकार भी जागृत थी। नतीजतन मुस्तफ़ा फ़िल्म का नाम तुरत फुरत बदलकर ‘गुलाम ए मुस्तुफा’ किया गया था।
आप तो ‘गुलाम ए सल्तनत’ न होईये।
पूछिये न मंत्री से की आपका ‘पठान’ और ऐसे ही सामग्री वाली फिल्मों, सीरियलों, विज्ञापनों से क्या ‘ अनुराग ‘ है?

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