
किसानों के नकद लोन खातों और खाद आवंटन में की गई हेराफेरी, जिम्मेदार संस्था प्रबंधक से काम छीना, नुकसान के बावजूद नहीं की कार्रवाई
इंदौर प्रीमियर को-आपरेटिव (आइपीसी) बैंक से जुड़ी चांदेर सेवा सहकारी संस्था में किसानों के नकद लोन खातों और खाद आवंटन के खातों में बड़ा घोटाला सामने आया है। कुछ खातों में किसानों से लोन की वसूली करके संस्था के रिकार्ड में जमा नहीं बताया गया है। खाद के लगभग 100 परमिट ऐसे हैं, जिन पर असली किसानों के हस्ताक्षर न होकर किसी और के हस्ताक्षर हैं। कुछ लोन खातों में भी फर्जी हस्ताक्षर होने की आशंका है। कुल मिलाकर संस्था में 74 लाख रुपये से अधिक का गबन हुआ है।
इस घोटाले में संस्था प्रबंधक संजय मौर्य, सहायक अंतरसिंह सोलंकी की लिप्तता तो है ही, बैंक की देपालपुर शाखा के अधिकारियों की भी लापरवाही रही। देपालपुर शाखा के अधिकारी भी संस्था का निरीक्षण और खातों की समय पर जांच नहीं कर पाए। बैंक मुख्यालय द्वारा की गई जांच में पता चला है कि कई खाते ऐसे हैं, जिनमें किसानों के खातों में ब्याज ही नहीं जोड़ा गया है। खाद का स्टाक भी कम पाया गया है। बिना बिल बनाए कई बड़े किसानों को खाद बांट दिया है। लगभग 24 लाख रुपये का घपला तो ट्रांसफर वाउचर का ही है। किसानों के खातों में बैंक में नकद राशि जमा नहीं की है, लेकिन संस्था की कैशबुक में इसे नकदी जमा करना दिखाया है। लगभग 4.75 लाख रुपये का लोन जमा करने की किसानों को रसीद दे दी, लेकिन संस्था की कैशबुक में इसका कोई उल्लेख नहीं है। इससे संस्था और बैंक दोनों को काफी नुकसान हुआ है, लेकिन जिम्मेदार संस्था प्रबंधक मौर्य के खिलाफ अभी कोई कार्रवाई नहीं की गई है। केवल उससे प्रबंधक का काम छीन लिया गया है। उल्लेखनीय है कि चांदेर संस्था में चांदेर, खड़ी, बरौदा और बेगंदा गांव के लगभग 1200 किसान सदस्य हैं।
प्रबंधक को बचाने के लिए सक्रिय हुए नेता और अफसर – चांदेर संस्था प्रबंधक मौर्य को बचाने के लिए कुछ नेता और अफसर भी सक्रिय हो गए हैं। प्रबंधक की ओर से भी पूरा जोर लगाया जा रहा है कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। आइपीसी बैंक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अनिल हर्षवाल ने बताया कि यह सही है कि संस्था और बैंक को नुकसान हुआ है, लेकिन अधिकांश गड़बड़ी लेखा-जोखा सही न रखने के कारण हुआ है। हमने संस्था प्रबंधक से काम लेकर उनकी जगह रामचंद्र चौहान को प्रबंधक की जिम्मेदारी दी है। दोषी प्रबंधक मौर्य की ओर से गबन के पैसों में से 18 लाख रुपये तक जमा भी करा दिए गए हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार हमें नहीं है। कार्रवाई सहकारिता विभाग के उपायुक्त कार्यालय से ही हो सकती है। हमारी तरफ से उपायुक्त कार्यालय को संस्था के विशेष आडिट के लिए लिखा गया है। आडिट रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी।
