आप सब के हृदय मे बैठे राम को प्रणाम करता हूं। हम ऐसे दौर में संवाद कर रहे हैं, जहां इसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता है। यह कथा ताली के समान है। ऐसी ताली जो कलयुग रूपी वृक्ष पर बैठे संशय रूपी पक्षी को उड़ाने वाली है। इस कलयुग में सबसे बड़ी समस्या संशय की है। हमारी संबंधधर्मिता संशय में बंटी हुई है। हमें व्यवस्थापकों, नेताओं, ग्राहकों पर ही नहीं, स्वयं पर भी शंका है। 20 वर्ष की आयु में एक लड़की ने अपना हीरोइन बनने का सपना पूरा किया। प्रेम करने का सपना पूरा किया। सारी स्वप्नधर्मिता जीने के बाद वह स्वयं पर इतनी शंकित है कि वह अपने ही प्राण ले रही है।’
एकलव्य और प्रहलाद छोड़ हमारे बच्चे टॉम, डिक & हैरी की कहानी सुन रहे कहानियों में संजीवनी शक्ति है। छोटे स्कूल जो विदेशी पाठ्यक्रमों से चल रहे हैं, जहां मर्यादा बताने वाला कोई पुरुषोत्तम नहीं है, उनमें टॉम, डिक, हैरी की कहानी पढ़ाई जा रही है। ऐसे हीरो की कहानी दिखाई जाती है जिसे कोई विश्वामित्र लेकर नहीं गया। ताड़का को मारते वक्त वह रोया नहीं। जंगल में उसकी पत्नी का अपहरण नहीं हुआ। वह वनवासियों की सेना बना लड़ा नहीं। पिछले दो दशक में जो कहानियां हमारे घरों तक भेजी गई, उनमें कोई पुरुषार्थ नहीं था। हमने एकलव्य, प्रहलाद के पुरुषार्थ की कहानियां सुनी हैं पर बच्चों को इनसे वंचित कर दिया। अंग्रेज भारत का धन ही नहीं तकनीकें, गौरवबोध भी ले गए।
संरक्षक बनें स्वामी नहीं- ‘माता-पिता बच्चों के संरक्षक (कस्टोडियन) हैं, पर स्वामी (ओनर) बन जाते हैं। ओनरशिप औरंगजेब और हिटलर पैदा करती है जबकि संरक्षक होने का भाव राम पैदा करता है। ये दुनिया सांसों के एक्सचेंज पर चल रही है, और आप बोल रहे हैं कि सांसों के मालिक आप हैं। संबंधों और संपत्ति को संरक्षक मानकर सेवा करो। वह तुम्हें बहुत कुछ देगी। पश्चिम ने लर्निंग हटाई : जानते हैं, सारी समस्या शिक्षा और लर्निंग के बीच है। शिक्षा नियमित है, लर्निंग अनियमित। शिक्षा ने नासा से सीखने के बाद कालगणना बताई। लर्निंग ने पंचांग के जरिए कई साल पूर्व गणना कर दी। पश्चिम ने योजनाबद्ध ढंग से हमारे समाज से, परिवारों से लर्निंग को हटाया।
एक चाणक्य 100 चंद्रगुप्त बना सकता है : एक गलत इंजीनियर पैदा हो जाएगा तो कुछ पुल गलत बनाएगा, पर एक शिक्षक गलत बना, तो पूरी पीढ़ी का नाश होगा। 100 चंद्रगुप्त भी एक चाणक्य नहीं बना सकते, पर एक चाणक्य 100 चंद्रगुप्त बना सकता है। यदि यहां किसी शिक्षक को ग्लानि है कि उसका वेतन तहसीलदार से कम है तो याद रखना शिक्षक ही ज्ञान की रोशनी को एक साथ सैकड़ों दीपकों में बांट सकता है।
