फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ठंडी तासीर वाली जन्नत का दहकता मुद्दा फिर चर्चा में है। मुद्दा तीन दशक पुराना है, लेकिन इसकी गरमाहट अब भी जस की तस है। कश्मीर के खौफनाक हालात के बीच भागकर इंदौर में बसे वीरेंद्र कौल अब 50 साल के हो चुके हैं। घर छोड़ने का दर्द उनके जेहन में आज भी कायम है। कौल के मुताबिक हमारा परिवार सेब के ट्रक में छिपकर उधमपुर आया था।
उधमपुर में डेढ़ महीने तक शरणार्थियों के साथ खुले में रहे। इसके बाद छह महीने जम्मू में रहे। जम्मू से निकलकर दिल्ली और गाजियाबाद के आसपास रहे, जहां सरकार ने हमें स्थान उपलब्ध कराया था। पढ़ाई पूरी होने के बाद 2001 में इंदौर आकर पीथमपुर में नौकरी की और 2005 में इंदौर में ग्लास का बिजनेस शुरू किया।
बहू-बेटियों को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ
वीरेंद्र ने बताया, 28 अक्टूबर 1989 का वह दिन मैं और मेरा परिवार कभी नहीं भूलेगा। उस वक्त मेरी उम्र मेरी 16-17 साल थी। मैं 9वीं में पढ़ता था। हमारे घर को एक हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ ने घेर लिया था और पास की मस्जिदों से आवाजें आईं कि बाहर निकलो। बहू-बेटियों को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ। हम सभी बाहर आए तो मुस्लिम युवकों की भीड़ खड़ी थी। सभी ने उपद्रव शुरू कर दिया। तब हमारे पास करीब 50 हजार रुपए के गहने थे।
वे घर का सामान लूटने लगे और हमारे मकान में आग लगा दी। एक व्यक्ति मेरी साइकिल ले गया जो मैं आज भी नहीं भूला हूं। हम सभी बेबस थे, क्योंकि वहां हर पंडित परिवार के साथ ऐसा ही हो रहा था। हमारा परिवार भी आधी रात में ट्रक में छुपकर भागा था। परिवार में माता-पिता के अलावा दो बहनें भी थीं। पड़ोसियों तक ने मदद नहीं की। पड़ोसी ही हमारा सामान उठाकर ले गए।
अखरोट-सेब के बगीचे छोड़कर भागना पड़ा
कौल को आज भी जब अपनी लुटी हुई गृहस्थी व जलते घर का मंजर याद आता है, तो उन्हें अंदर तक झकझोर देता है। हजारों लोगों की भीड़ में किस तरह उन्हें परिवार के साथ वहां से भागना पड़ा था। खुद के अखरोट व सेब के बाग उन्होंने किन हालात में छोड़े, यह पीड़ा आज भी है।
याद आता है पुश्तैनी मकान
कौल ने भले ही इंदौर में अपना बिजनेस जमा लिया हो, लेकिन खूबसूरत कश्मीर और वहां अपना पुश्तैनी मकान आज भी याद आता है। कौल ने बताया कश्मीर के हालात 1986 से बिगड़ना शुरू हुए , जबकि इसके पहले सब अच्छा चल रहा था। फिर आतंकवाद व अलगाववाद से जो हालात पैदा हुए वे किसी से छिपे नहीं है। मेरे परिवार में तब 8 लोग थे। सभी पर बहुत अत्याचार हुए। कई परिवारों को अपना घर, मकान, बाग बेचकर पलायन करना पड़ा।
1986 में घाटी में पंडितों को भगाने जैसे अत्याचार शुरू हुए। इस दौरान काफी संघर्ष भी हुआ और पूरा इलाका कर्फ्यू के साए में रहा। फिर जिस तरह घाटी से पंडितों को भगाना शुरू किया तो उस दौरान मेरी स्कूली शिक्षा चल रही थी। हमारा घर पुलवामा के पास था जो कश्मीर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। हमारे मकान के आसपास और भी पंडित रहते थे।
कश्मीर में वापस बसना चाहते हैं
वीरेंद्र के मुताबिक सरकार ने कुछ समय पहले कहा था कि कब्जा ले लो। तीन साल पहले जब उन्होंने कश्मीर जाकर अपना मकान देखा तो खंडहर बन चुका था। उसके खिड़की-दरवाजे तक लोग ले गए थे। उनका मकान 4 मंजिला था ऊपर की दो मंजिल जल गई थीं, जबकि ग्राउंड फ्लोर व पहली मंजिल को थोड़ा नुकसान हुआ था।
वीरेंद्र ने बताया कि मंदिर का गुम्बद तक तोड़ दिया गया था। सरकार से हमारा एक ही कहना है कि सभी को कश्मीर में एक जगह बसाए और सामूहिक सुरक्षा दें। ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में 30 प्रतिशत सच्चाई है जबकि 70 प्रतिशत नर्क बताया नहीं गया है। इंदौर बहुत अच्छा शहर है। आज भी हम कश्मीर जाकर बसना चाहते हैं, लेकिन हमारी सुरक्षा की गारंटी पूरी हो।
