आस्था, श्रद्धा, भक्ति और मन मे विश्वास का भाव रख आया… आगे बैठने का विचार घर से खुद ही कर आया… लड़ते-झगड़ते स्थान है पाया… छायाचित्र अपने मोबाइल में कवर नही कर पाया… चाय से ज्यादा केटलियाँ गरम है अपने साथियों से यह बोलता नजर आया… भीड़ में घूस स्थान तो पाया… लेकिन कथावाचक के विचार अपने अंदर कहाँ उतार पाया… वो तो भीड़-भाड़ और नजारा देखने को आया… वो कहाँ ज्ञान की बात अपने अंदर उतारने आया… घण्टों कथा सुनने के बाद भी कुछ याद न रख पाया… तो कहां हैं “वो” तुम्हारे अंदर की इच्छा शक्ति जो 4 घंटे का सार भी समझ न पाया… शुक्रवार को मंच से बहुत अच्छा उदाहरण है बताया… महिलाओ को इशारों में समझाया… मधुमक्खियां ( पुरुष ) बहुत भिन्न भिन्ना रहीं हैं… तुम्हारे घरों के बाहर भी नजर आ जाएंगी… वस्त्रों को सलीके से पहनो… मजाल है वो तुम्हारे ऊपर भिन्न भिनाएगी… पंडित जी ने कथा में आज के हालात बयां कर दिए… उदाहरण दे सभी को इशारा कर गए… न समझो को इशारा भी समझ नही आता… समझदारों को इशारों में ही आंखों में पानी आता… लाखो की भीड़ में भी “वो” तुम्हारी हकीकत है बताता फिर भी उनका ज्ञान किसी के समझ मे कहाँ आ पाता… वो तो बस कथा सुनने आता… अपने मन के भावों को सिर्फ 4 घण्टे ही रमाता… चिट्ठियों को बड़े ध्यान से सुन जाता… अपना तो हो ही नही रहा कुछ पास वाले से ऐसा बोल जाता… भक्ति में तुम्हारी शक्ति नही है… भावों में तुम्हारे कमी सी है… अभी तुम्हें उनकी कृपा होने में समय लगेगा… मन के भावों को शुद्ध करना पड़ेगा… छल, कपट से दूर रहना होगा… जब तक मन चाहा आशीर्वाद न मिले तब तक एक लौटा जल तुम्हें चढ़ाना होगा
