इंदौर उच्च न्यायालय के अधिवक्ता तनुज दीक्षित ने बताया की फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफ़ा देना अब एक ट्रेंड बन चुका है, जब भी किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है तो सदन में फ्लोर टेस्ट से ही उसकी नतीजा निकलता है. कई बार जब सरकारें देखती हैं कि उनके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं हैं तो फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे देती हैं. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के पहले कर्नाटक व अन्य राज्यों में भी ऐसा हो चुका है.
फ्लोर टेस्ट को हिंदी में विश्वासमत कहते हैं. फ्लोर टेस्ट के जरिए यह फैसला लिया जाता है कि वर्तमान सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है या नहीं. अगर मामला राज्य का है तो फ्लोर टेस्ट विधानसभा में होता है, और केंद्र का हो तो लोकसभा में. फ्लोर टेस्ट सदन में चलने वाली एक पारदर्शी प्रक्रिया है और इसमें राज्यपाल का किसी भी तरह से कोई हस्तक्षेप नहीं होता. फ्लोर टेस्ट में विधायकों या सासंदों को सदन में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होता है और सबके सामने अपना वोट देना होता है.
तनुज ने यह भी बताया की भारत में पहले बहुमत साबित करने के लिए फ्लोर टेस्ट नाम की कोई चीज नहीं होती थी. इसकी शुरुआत हुई 1989 में जब कर्नाटक में बोम्मई सरकार गिरने के पांच साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट अनिवार्य कर दिया था. रिट याचिका के जरिए मौजुदा सरकार राज्यपाल के फ्लोर टेस्ट को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई करवा सकती है।
महाराष्ट्र में आज तक फ्लोर टेस्ट में कोई सरकार नहीं गिरी है. 1 मई 1960 को महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ था. उसके बाद से 14 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और 19 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन अब तक इस बार भी फ्लोर टेस्ट में बहुमत सरकार के खिलाफ नहीं गया है. साल 2014 में देवेंद्र फडणवीस ने फ्लोर टेस्ट में विश्वास मत हासिल करके सरकार बचाई थी. उसके बावजूद उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट के पहले ही रात 12 बजे राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौप दिया।
