
भारत के महामनीषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को जन उत्सव बनाया।
चौपाटी में समुद्र के किनारे बाल गंगाधर तिलक अकेले बैठे हुए थे। अरब सागर की बड़ी-बड़ी लहरें बार-बार किनारे पर आकर यूँ टकरा रही थीं, मानो उनके मन के भीतर चल रही उथल-पुथल को बयाँ कर रही हों। कुछ सोच नहीं पा रहे थे तिलक कि कैसे देश के लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एकजुट किया जाए।
इससे पहले 1857 में एकता के इसी अभाव के कारण अंग्रेज़ों को हराया नहीं जा सका था। जातियों के बीच भेदभाव की दीवारें इतनी ऊँची थीं कि भारतीय एक नहीं हो पा रहे थे। ऊपर से चालाक अंग्रेज़ों ने किसी भी तरह के राजनीतिक या सामाजिक जमावड़े पर रोक लगा रखी थी।
वे नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना पनपे लेकिन जब तक हर तबके के लोग एक नहीं होते, आज़ादी मिलेगी कैसे? यह सवाल तिलक को भीतर ही भीतर खा रहा था। उनकी इसी बेचैनी का नतीजा था गणेश उत्सव, जिसकी धूमधाम और भव्यता आज देशभर में देखने को मिलती है।
महाराष्ट्र से शुरू हुए गणेश उत्सव के रंग धीरे-धीरे पूरे देश में फैल चुके हैं। गणपति बप्पा की विशाल प्रतिमा के सामने भक्तों के सैलाब और विसर्जन के दौरान नाच-गाने की तस्वीर आज सभी के लिए जानी-पहचानी है लेकिन, हमेशा से ऐसा नहीं था। छत्रपति महाराज शिवाजी और उनके मंत्री गण पेशवा अपने कुलदेवता गणपति की पूजा घर में ही करते थे। यह परंपरा चालुक्य और राष्ट्रकूट शासकों के समय से चली आ रही थी। तिलक ने इस घरेलू त्योहार को राष्ट्रीय उत्सव में बदल दिया। इसके पीछे उनकी सोच थी कि सभी देशवासियों को एक शामियाने के नीचे लाकर उनमें राष्ट्रीयता का बोध पैदा किया जाए।
सन 1857 के नाकाम विद्रोह के बाद देश भयंकर निराशा के दौर से गुजर रह था। इन हालातों में तिलक अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक जनमत तैयार करने की कोशिशों में जुटे थे। उनके व्यक्तित्त्व और भाषणों से प्रभावित होकर उनके अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसी का नतीजा था कि वह ‘लोकमान्य’ कहलाने लगे। अपने ख़िलाफ़ लगातार बढ़ रहे जनमत से ब्रिटिश शासन डर गया। उसे यह समझ में आ गया था कि केवल दमन की नीति से भारतीयों को रोक कर नहीं रखा जा सकेगा। इसी सोच की उपज थी कि 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ। लिहाज़ा, कांग्रेस में रहते हुए भी शुरू से तिलक का रास्ता अलग रहा।
वह कांग्रेस की गतिविधियों में मन न लगाकर हमेशा अपनी समझौता विहीन लड़ाई के मैदान में मौजूद रहते। उन्हें एक ऐसे जन मुद्दे की तलाश थी, जिसके इर्द-गिर्द सभी को अंग्रेज़ों के विरुद्ध एकजुट किया जाए और आज़ादी छीन ली जाए। सन 1892 में बॉम्बे से पूना लौटते समय ट्रेन में एक संन्यासी ने उनसे कहा, ‘हमारे राष्ट्र की रीढ़ धर्म है।’
लोगों की धर्मपरायणता का इस्तेमाल राष्ट्रीयता बोध पैदा करने के लिए कैसे हो? समुद्र के किनारे बैठकर यह सोचते-सोचते उनके दिमाग़ में एक बिल्कुल नया विचार आया। महाराष्ट्र में तब ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण के बीच भयंकर विवाद होने से एकता भंग हो रही थी। ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच विभेद मिटाने की स्वयं अगुवाई करेंगे सिद्धिदाता गणपति। यह विचार आने के बाद तिलक ने बिल्कुल देर नहीं की।
1893 में ही उन्होंने केशवजी नाइक चॉल सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की नींव डाली। इस मंडल की कोशिशों से ही पहली बार विशाल गणपति प्रतिमा के साथ गणपति बप्पा का पूजोत्सव शुरू हुआ। इस उत्सव के मंच से तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। मराठी लोकगीत पोवाडे के सुर में देश से लगाव की कथा गायी जाने लगी। देशप्रेम के भाषण होने लगे। इन्हें सुनने के लिए हर साल झुंड के झुंड लोग गणेश उत्सव के मैदान में पहुंचने लगे। गणेश उत्सव अब महाराष्ट्र के कोने-कोने में पहुँच गया था। इसने राज्य को जगा दिया था।
तिलक चाहते थे कि यह उत्सव राष्ट्रीय उत्सव में बदले। लेकिन, कांग्रेस नेतृत्त्व इसके लिए राजी नहीं हुआ। लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पॉल जैसे कुछ नेताओं का समर्थन ज़रूर मिला, लेकिन सुरेंद्रनाथ बैनर्जी, दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले से लेकर मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू जैसे ज़्यादातर बड़े कांग्रेस नेता, तिलक के इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ थे। दरअसल, मुंबई में 1893 में हुए हिंदू-मुसलमान दंगे के चलते कांग्रेस नेता इस तरह के आयोजन के लिए सहमत नहीं थे। लेकिन, उनका यह विरोध जबरदस्त जनसमर्थन की लहरों में बह गया।
एक जमाना था, जब गणपति उत्सव के मंच से इस्लाम धर्म के राष्ट्रवादी नेता भाषण दिया करते। इस मंच से नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरोजिनी नायडू जैसी हस्तियों ने देशवासियों को संबोधित किया। नासिक में गणपति उत्सव को केंद्र करके मित्र मेला शुरू हुआ। नागपुर, अमरावती जैसे शहरों में भी यह उत्सव धूमधाम से होने लगा। गणेशोत्सव की इस लोकप्रियता के बूते बाद में तिलक ‘स्वराज’ की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर पाए थे। इस उत्सव ने ब्रिटिश प्रशासन को डरा दिया था। रॉलेट कमेटी की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है। मेले में ब्रिटिश विरोधी गीत, राष्ट्रवादी सामग्री वाले पर्चों का वितरण उनकी नज़रों से बच न सका। आखिरकार तिलक ने धार्मिक आयोजन की आड़ में राष्ट्रवाद की जो अलख जगायी, वह आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य के पतन का कारण बनी।
गणेशोत्सव की धूमधाम के बीच भारतवासियों के बीच देश-प्रेम सदा जीवित रहे, यही लोकमान्य तिलक को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
