एक निर्दोष ,गरीब आदमी 20 साल जेल की सलाखों में रहा आखिर दोषी कौन पुलिस , न्यायालय, वकील या ??

By Abhishek Raghuvanshi
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यह दिल दहलाने वाली न्यायिक घटना उत्तर प्रदेश के ललितपुर के एक गांव में रहने वाले विष्णु तिवारी की है जिसने 20 साल तक उस जुर्म की सजा जेल में रहकर गुजारनी पड़ी, जो उसने किया ही नहीं था! इस व्यक्ति पर वर्ष 1999 में अनुसूचित जाति की एक महिला के साथ बलात्कार, आपराधिक धमकी देने और यौन शोषण करने का आरोप लगाया गया था और ललितपुर जिले की सेशन अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद इसे दोषी पाया था!?
विष्णु तिवारी पर जब हरिजन एक्ट और रेप का मामला महरौनी कोतवाली में दर्ज किया गया था उस समय विष्णु की उम्र मात्र 18 वर्ष थी। जिसके बाद सेशन कोर्ट द्वारा पुलिस की विवेचना रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 2000 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी.? वर्ष 2005 में, उसने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने का फैसला किया और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

16 साल लग गए सजा के खिलाफ सुनवाई का नंबर हाईकोर्ट में आने के लिए !?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामले में प्राथमिकी तीन दिन की देरी से दर्ज की गई थी और महिला के निजी अंगों पर कोई चोट नहीं थी, जबकि महिला का कहना था कि उसको जमीन पर पटका गया था। शिकायतकर्ता की ओर से रिपोर्ट लिखाने का मकसद था क्योंकि दोनों पक्षों के बीच भूमि विवाद था और एफआईआर भी कथित पीड़िता के द्वारा नहीं बल्कि उसके पति और ससुर द्वारा दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि तथ्यों और रिकॉर्ड पर सबूतों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि अभियुक्त को गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है। इसलिए, ट्रायल कोर्ट के फैसले और लगाए गए आदेश को पलटा जा रहा है और अभियुक्त को बरी किया जाता है।
20 साल बाद हाई कोर्ट द्वारा विष्णु तिवारी को रेप और एससी/एसटी एक्ट के मामले में मिली आजीवन कारावास की सजा में निर्दोष साबित करते हुए रिहाई का आदेश दिया इसके बाद विष्णु तिवारी आगरा जेल से रिहा होकर अपने घर पहुंच गया है। विष्णु का कहना है कि इन 20 सालों में उसने अपना सबकुछ खो दिया।
विष्णु तिवारी ने बताया कि जेल की सजा के दौरान उसके परिवार में चार मौतें हो गईं। पहले उसके माता-पिता की मौत हुई और बाद में इसी सदमे ने दो भाइयों की भी जान ले ली. लेकिन उसे किसी की भी मौत में जाने के लिए जमानत या पेरोल नहीं दिया गया!?
विष्णु तिवारी ने बताया कि पशुओं को लेकर एक विवाद हुआ था. जिसके बाद दूसरे पक्ष ने थाने में शिकायत की थी। थाने में तीन दिन एफआईआर नहीं हुई, तो राजनीतिक दबाव डलवाकर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया गया था। पुलिस जांच से जुड़े सवाल पर विष्णु तिवारी ने कहा कि हम तो अनपढ़ आदमी थे। हमें न पुलिस जांच का पता चला। न ये पता था कि वकील कौन है। क्या हो रहा है। कैसे सजा दी। कुछ भी पता नहीं चला !?

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