मध्य प्रदेश में जनसंख्या वृदि्ध दर राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है। पिछले एक दशक में यह 20 फीसद है, जबकि राष्ट्रीय औसत 17 फीसद है। दिग्विजय सरकार ने राज्य में जनवरी 2000 में जनसंख्या नीति लागू की थी, लेकिन पिछले 21 वर्षों में इस नीति की न तो समीक्षा हुई न ही विश्लेषण किया गया, अत: जनसंख्या दर घटाने की कार्रवाई आवश्यक है। इस मांग का लीगल नोटिस राज्य के मुख्य सचिव को भेजा गया है।
20 वर्षों में ठोस प्रयास नहीं किए गए : नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच, जबलपुर के प्रांताध्यक्ष डॉ.पीजी नाजपांडे ने उक्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 1976 में यह बिंदु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 में शामिल किया था, व राज्यों में नियम बनाने के अधिकार सौंपे थे, लेकिन इन 45 वर्षों में व राज्य में जनसंख्या नीति बनने के 20 वर्षों में ठोस प्रयास नहीं किए गए। इसलिए जनसंख्या के दबाव में स्रोत कम पड़ रहे हैं, विकास प्रत्यन्न विफल हो रहे हैं, गति धीमी पड़ रही है
कमेटियां ठप पड़ी : वर्ष 2000 में लागू की गई जनसंख्या नीति का पालन करने के लिए राज्य स्तरीय दो कमेटियां व जिला स्तरीय कमेटियां बनाई गई थीं, लेकिन ये कमेटियां कुंभकर्णी निद्रा में मशगूल हैं। नागरिक उपभोक्ता मंच के नयागांव, जबलपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता रजत भार्गव, अनिल पचौरी, डॉ.एबी श्रीवास्तव, डीआर लखेरा, डॉ.एमएसबी राव, एडवोकेट प्रभात यादव ने बताया कि जनसंख्या दर घटाने से शुद्ध हवा, स्वास्थ्य, विकास, निवास, शिक्षा, जीवन-स्तर की सुविधाएं आदि भारतीय संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकार नागरिकों के लिए सुरक्षित रहेंगे। ऐसा न होने पर अधिकारों का हनन बदस्तूर जारी रहेगा।
