नोटों और आभूषणों से सजने लगा महालक्ष्मी मंदिर, धनतेरस से पांच दिन तक दिखेगा मंदिर का वैभव

By Abhishek Raghuvanshi
4 Min Read
रतलाम की महालक्ष्मी का अद्भुत वैभव

मां महालक्ष्मी के वैभव के अदभुत नजारें यूं तो विश्वभर में अनेकों जगह देखे जा सकते हैं, लेकिन हम यहां मध्यप्रदेश के एक ऐसे शहर की बात कर रहे हैं जहां पर नगरवासी दीपावली पर मां लक्ष्मी के चरणों मेें अपने सारे जेवर समर्पित कर देते हैं, जिनमें माता के मंदिर का श्रृंगार होता है और नोटों के वंदनवारों से मंदिर का श्रृंगार होता है।

हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश की स्वर्ण नगरी रतलाम की। कहते हैं रतलाम का सोना और रतलाम के नमकीन की गुणवत्ता की तुलना दुनिया में अद्वितीय है। चमकीले सोने के लिए प्रसिद्ध रतलाम नगरी की महालक्ष्मी माता का वैभव भी अद्वितीय है। विश्व में ऐसा कोई मंदिर नहीं होगा जहां दो हजार-पांच सौ के नोटों के वंदनवारे सजाए जाते हों या करोड़ों अरबों के जेवरात से मंदिर की साज-सज्जा की जाती हो। हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वह मध्य प्रदेश के रतलाम के माणक चौक में स्थित है। इस मंदिर का नाम महालक्ष्मी मंदिर है। इस मंदिर में लोग अपने सभी जेवरात माता को समर्पित कर देते हैं। जिससे मंदिर में दीपोत्सव के पांचदिनों तक साज-सज्जा की जाती है। लोगों में मान्यता है कि ऐसा करने से उनके धन में इजाफा होता है। मंदिर में श्रद्धालु सोने-चांदी के आभूषण तथा नोटों की गड्डियां लेकर पहुंचते हैं। इनकी एंट्री मंदिर मंदिर के रजिस्टर की जाती है और उसका टोकन दिया जाता है। भाईदूज के बाद टोकन के आधार पर नोट-आभूषण लौटा दिये जाते हैं।

धन हो जाता है दोगुना सजावट के बाद धनतेरस के दिन विधि-विधान से मां महालक्ष्मी की पूजा की जाती है। रतलाम ही नहीं आसपास के अन्य शहर के लोगों की भी मान्यता है कि महालक्ष्मी मंदिर में श्रृंगार के लिए लाए गए आभूषण और धन से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और वर्ष भर में धन दोगुना हो जाता है। महालक्ष्मी मंदिर की सजावट धनतेरस के आठ दिन पहले से ही प्रारंभ कर दी जाती है। इस दौरान लोग यहां सोने एवं चांदी के सिक्के भी भारी मात्रा में लेकर पहुंचते है।
बरसों से चली आ रही है यह परंपरा मां लक्ष्मी के इस मंदिर में सोने-चांदी और नोटों की गड्डियां चढ़ाने की यह परंपरा बरसों से चली आ रही है। यहां आने वाले श्रद्धालु, माता के चरणों में जो भी आभूषण और नकदी अर्पित करते हैं। बाद उसे भक्तों को प्रसाद के रूप में लौटा दिया जाता है।

राजा को दिया था स्वप्र महालक्ष्मी मंदिर के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि रतलाम शहर पर राज करने वाले तत्कालीन राजा को महालक्ष्मी माता ने स्वप्न दिया था। इसके बाद से उन्होंने ही यह परंपरा प्रारंभ की थी जो आज तक चल रही है। इस मंदिर की अनूठी पंरपरा के चलते ही यह देश का शायद पहला एवं एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां पर धन की देवी लक्ष्मी की सजावट सिर्फ धन-वैभव यानी जेवरात और नोटों से की जाती है।

Exit mobile version