अफगानिस्तान के 70 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर चुका है तालिबान, ताजा हालात पर मंथन

By Abhishek Raghuvanshi
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  • बहुतों के मन की मुराद पूरी हुई !
  • दशकों से दहशतगर्दी और आतंकवाद परास्त होते आ रहे थे !
  • ईरान और इराक से शुरू हुई मौत की जंग जीत न पा रही थी !
  • 9/11 हुआ पर करने वाले हार गए , 26/11 हुआ , वह करने वाले भी दुनिया जहान से तमाम कर दिये गए !
  • जहालत बार बार रुसवा हुई , खौफ़ की बार बार मौत हुई !
  • पर इस बार कट्टरपंथी जीत गई , खूनखराबा जीत गया , मौत का तांडव जीत गया , खुशियां तबाह हुई , रौशनी गुम हुई !
  • 21वीं शताब्दी में मध्ययुग जीत गया , घनघोर अंधेरा जीत गया !

अफसोस ! जो काम लादेन और बगदादी जैसे क्रूर खलनायक नहीं कर पाए , कत्लखानों के दरिंदे तालिबानियों ने कर दिखाया । एक भरा पूरा देश ही कब्जा लिया । औरतें लुटने लगीं , कांपने लगीं , बेरहम कोड़े और बेंत खिलखिलाने लगे । गोलियाँ मुस्कुराने लगी , जख्म और नमक मचलने लगे , जिंदगी थर थर कांपने लगी , आग , शोले और धमाके बरसने लगे । ठण्ड जाती रही सुलगती गर्म हवाएं चलने लगी । एक अच्छा भला देश दहशतगर्दी की कैद में चला गया । रात का राज हुआ , दिन खो गया । तालिबानी आ बैठे , कमजोर राष्ट्रपति अब्दुल गनी देश को बिलखता छोड़कर भाग खड़े हुए । मतलब तालिबान का क्लीन स्वीप ।

चीन तो खैर तालिबानियों को सबसे पहले मान्यता देने वाला देश बनेगा और पाकिस्तान ने उसे पाला पोसा ही है । बात 56 इस्लामिक देशों की नहीं करेंगे , उन्हें कट्टरता से कोई एतराज है ही नहीं । पहले यह नृशंसता हिंदुओं , इस्राइलियों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ होती थी । ईरान , इराक , सूडान , सीरिया , अफगानिस्तान , अजरबैजान के उदाहरण बताते हैं कि कट्टरवाद की हिंसा अब इस्लाम के उदारवादियों पर भी हुआ करेगी । तालिबानियों ने जिन्हें लूटा है , जिन्हें काटा है , जिन्हें देश से भगाया है , गोलियों से उड़ाया है , वे मुसलमान ही हैं । पर मजा देखिये , देश का विनाश हो जाने पर भी किसी इस्लामिक देश का बयान या ट्वीट नहीं आया है । किसी भी देश के मुस्लिम नेता ने इसकी भर्त्सना तो क्या , सामान्य निंदा तक भी नहीं की है ।

मलाल इस्लामिक देशों से अधिक अमेरिका और रूस का है । संसार की दोनों महाशक्तियों ने अफगानिस्तान में जनतंत्र को मरते देखा है । हाहाकार , हाय हाय और चीखोपुकार को जिंदा होते देखा है । कमाल की बात है कि अमेरिका ने पहले तालिबान को पैदा किया , फिर उसे मारा और देश से जाने से पहले तालिबान को फिर जिंदा कर दिया । और तो और , अपने खतरनाक हथियारों का जखीरा भी आतंकी तालिबानियों के लिए छोड़ गया । रूस ने भी तालिबान को नहीं रोका । देखना रूस भी एकदिन तालिबान को मान्यता देगा । आश्चर्य तो संयुक्त राष्ट्र संघ पर होता है । आश्चर्य होता है कि सफेद हाथी बना यह अंतरराष्ट्रीय संगठन है ही क्यौं ? क्या वजूद है उसका , जब उसने एक बार भी तालिबान समस्या का हल न खोजा और चुपचाप तमाशा देखता रहा ?

मध्य युग में भारतवासियों का क्या हाल हुआ होगा , जो लोग यह जानना चाहते हैं , वे अफगानिस्तान को देख लें । अफगानी जनता जो आज भोग रही है , भारत की निरीह जनता ने वही सब मध्यकाल की शताब्दियों में भोगा था । अफसोस की बात है कि आज के कथित सभ्य समाज के सब कुछ जानते समझते यह सब हो गया है । राष्ट्रपति सहित तमाम नेता देश छोड़कर उज्बेकिस्तान , दुबई और अन्य देशों में चले गए हैं । कईं भारत आए हैं ।

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अफगानिस्तान कभी अखंड भारत का अंग रहा था । दुश्मन पाकिस्तान और दुश्मन चीन के हाथों में खिलौना बना तालिबान भारत के लिए अब नए दुश्मन के रूप में सामने आ सकता है । यद्यपि अभी वह भारत से दोस्ती की बात कर रहा है । इतनी विशाल दुनिया के रहते आतंकवादी गोलियों के दम पर कोई देश कब्जा लें , आधुनिक जगत के लिए यह खतरे की घण्टी है । तो आइए , मानवता के निधन का शोक मनाते हैं । और कर भी क्या सकते हैं ?

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