किसी भी दल की परंपरागत सीट नहीं रही है बदनावर उपचुनाव पहली बार हो रहा है बदनावर में

By Abhishek Raghuvanshi
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बदनावर विधानसभा किसी पार्टी की परंपरागत सीट नहीं रही है। मतदाताओं को यदि पार्टी प्रत्याशी समझ नहीं आता है, तो उसे बिना किसी मुरव्वत के तत्काल नापसंद कर दिया जाता है। इसलिए यह मुगालता कोई पार्टी नहीं पाल सकती है कि बदनावर की सीट तो उसकी अपनी है और यहां से किसी भी प्रत्याशी को खड़ा कर दिया जाए, तो वह जीत जाएगा।

1957 से 2018 तक संपन्ना हुए 14 चुनावों से पता चलता है कि अब तक 7 बार कांग्रेस और 7 बार विपक्षी पार्टी यानी जनसंघ, जनता पार्टी व अब भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों को विधायक बनने का मौका मिला है। 1957 के पहले चुनाव में बदनावर विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी मनोहरसिंह मेहता विजयी हुए थे, किंतु 1962 में हुए अगले चुनाव में उन्हें जनसंघ के डॉ. गोवर्धनलाल शर्मा ने पराजित कर दिया। डॉ. शर्मा 1967 के में भी लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए, किंतु 1972 में कांग्रेस प्रत्याशी चिरंजीलाल गुप्ता विजयी हुए और उन्होंने तत्कालीन जनसंघ के नेता वसंतराव प्रधान को पराजित किया। जबकि 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के प्रत्याशी डॉ. गोवर्धनलाल शर्मा तीसरी बार विधायक चुने गए। इसके बाद फिर 1980 के चुनाव में कांग्रेस ने रघुनाथसिंह माथुर को खड़ा किया और उन्होंने तत्कालीन भाजपा प्रत्याशी रमेशचंद्रसिंह राठौर गट्टू बना को पराजित कर दिया। 1967 में भी कांग्रेस की ओर से माथुर खड़े हुए थे, किंतु उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था और दोबारा यह स्थिति 1985 में फिर देखने में आई, तब उन्हें भाजपा के रमेशचंद्र सिंह राठौर ने पराजित कर 1980 की हार का बदला ले लिया।

इसके पश्चात 1990 में हुए चुनाव में मतदाताओं ने काग्रेस को पसंद किया और पहली बार चुनाव मैदान में उतरे कांग्रेस प्रत्याशी प्रेमसिंह दत्तीगांव को विजयी बनाया। तब उनका मुकाबला भाजपा के जगदीश प्रतापसिंह राठौर से हुआ था, किंतु कांग्रेस की विजय का सिलसिला 1993 फिर टूट गया। तब भाजपा के रमेशचंद्रसिंह राठौर विधायक चुने गए और उन्होंने प्रेमसिंह दत्तीगांव को पराजित किया। इसके पश्चात 1998 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी से राजनीति में प्रवेश करने वाले राजवर्धनसिंह दत्तीगांव अब तक कुल मिलाकर 5 में से 3 बार विधायक चुने गए। पहली बार 1998 में जब प्रेमसिंह दत्तीगांव को तीसरी बार टिकट नहीं मिला, तो इससे असंतुष्ट होकर उनके पुत्र राजवर्धनसिंह ने निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी मोहनसिंह बुंदेला व भाजपा प्रत्याशी खेमराज पाटीदार के बीच त्रिकोणीय मुकाबले में पाटीदार विजयी हुए, किंतु उसके बाद 2003 से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजवर्धनसिंह दत्तीगांव ही चुनाव लड़े और 2003 और 2008 में लगातार विधायक चुने गए, पर 2013 में उन्हें भाजपा के भंवरसिंह शेखावत से पराजय का सामना करना पड़ा। 5 साल बाद ही 2018 में उन्होंने अपनी पिछली पराजय का बदला लेते हुए शेखावत को बहुत बड़े अंतर यानी 41 हजार मतों से हरा दिया। अब 2 साल बाद ही फिर चुनाव की नौबत आई है और दत्तीगांव इस बार कांग्रेस की बजाय भाजपा से चुनाव मैदान में उतरे हैं। इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस के कमलसिंह पटेल से हैं, जो कभी उनके खास रहे थे।

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